बेमिसाल बलिदान

हमारी सेना और अन्य सुरक्षाबलों के जांबाज देश के भीतर और सीमा पर अपनी हिम्मत और हौसले से लबरेज शहादत की शानदार इबारत बार-बार लिखते रहे हैं। चाहे आपदाओं की चपेट में आये नागरिकों का बचाव करना हो या फिर आतंक के खौफ से लोहा लेना हो, बहादुर जवानों ने हमेशा अपने फर्ज को बखूबी अदा किया है। पड़ोसी देशों के हमले हों या फिर नापाक इरादों को अंजाम देने की फिराक में घुसपैठिये हों, सेना, अर्द्धसैनिक बल और पुलिस में कार्यरत सैनिकों ने जान की परवाह न करते हुए देश की रक्षा की है। वीरता और बलिदान की यह गाथा सिर्फ देश तक ही सीमित नहीं है, दुनिया में अमन-चैन की बहाली और हिंसक संघर्षों में फंसे अनेक देशों के नागरिकों की मदद में भी हमारे सैनिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। विश्व संस्था संयुक्त राष्ट्र के बैनर तले गठित शांति सेना की गतिविधियों में शहीद हुए जवानों में सबसे बड़ी तादाद भारतीयों की है। वर्ष 1948 से अब तक शांति सेना के 3,737 सेनानी शहीद हुए हैं, जिनमें 163 भारतीय हैं। इस सेना में हिस्सेदारी के लिहाज से भारत तीसरा सबसे बड़ा देश है। अबाई, साइप्रस, कॉन्गो, हैती, लेबनान, मध्य-पूर्व, दक्षिणी सूडान और पश्चिमी सहारा क्षेत्र में हमारे 6,693 सैनिक और पुलिसकर्मी बहाल हैं। संयुक्त राष्ट्र के नीले झंडे के तले फिलहाल 124 देशों के 96 हजार से अधिक सैनिक, 15 हजार के करीब अन्य कर्मचारी और लगभग 16 सौ संयुक्त राष्ट्र के स्वयंसेवक कार्यरत हैं। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अंतोनियो गुत्तेरेस ने सही ही रेखांकित किया है कि अपनी स्थापना का सातवां दशक पूरा कर रही इस सेना ने विश्व शांति, सुरक्षा और समृद्धि में अहम भूमिका अदा की है। भारत हमेशा से दुनिया में अमन और बराबरी का जोरदार पैरोकार रहा है। शांति सेना में हमारी सक्रिय भागीदारी इसी संकल्प को इंगित करती है। संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के 71 अभियानों में से 50 में भारत की भागीदारी रही है। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शांतिसैनिकों का अभिवादन करते हुए कहा था कि भारत हमेशा ऐसे प्रयासों में सहभागिता देता रहेगा। हालांकि, यह भी एक विडंबना ही है कि महती भूमिका के बावजूद सुरक्षा परिषद में शांति सेना के प्रशासन और उसकी योजना बनाने में भारत समेत अन्य कई देशों की बात ठीक से सुनी नहीं जाती है। भारत इस मुद्दे पर अपनी शिकायत भी दर्ज कराता रहा है। सैनिकों के भुगतान में देरी, संसाधनों की कमी और समुचित प्रशिक्षण की कमी जैसी समस्याओं पर भी भारत ने ध्यान दिलाया है। संयुक्त राष्ट्र की संरचना और कार्यशैली में जरूरी सुधार की मांग भी लंबित है। यह संगठन, खासकर सुरक्षा परिषद, चंद देशों के स्वार्थों और आपसी खींचतान का अखाड़ा बन गया है, जिसके कारण भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देशों की आकांक्षाएं बाधित हो रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर योगदान और बलिदान के हिसाब से देशों को उनका अधिकार भी मिलना चाहिए।

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