एंटी इनकंबैंसी का तापमान

प्रो योगेंद्र यादव
मई और जून के महीने में अक्सर सरकारों को लू लगजाती है। खास तौर पर उन सरकारों को, जो चार साल तक राजधानी के एयर कंडीशन कमरों में बंद रहती हैं। जब मंत्री लोग चुनावी साल में जनता के बीच धूप और धूल फांकते हैं, तो अक्सर वे जनाक्रोश की लू का शिकार हो जाते हैं। इस स्थिति में अच्छे-अच्छे चुनावी डॉक्टर भी मरीज को बचा नहीं पाते हैं। और पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट में मौत का कारण ‘एंटी इनकंबैंसी’ लिखा जाता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार साल दिल्ली के एयर कंडीशन कमरों में बंद रहनेवाले नेता नहीं हैं। इसलिए कई गर्मियां आयीं और गयीं, लेकिन मोदीजी चुनावी लू का शिकार नहीं हुए।
देश में लगातार दो साल सूखा भी पड़ा, लेकिन मोदीजी के नेतृत्व में बीजेपी की चुनावी फसल लहलहाती रही। नोटबंदी जैसी दुर्घटना से भी उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। पिछले चार साल से पाप और पुण्य की परवाह किये बिना, सच और झूठ की चिंता किये बिना, मोदीजी ने जिस तरह चुनावी विजय का अभियान चलाया है, वह अभूतपूर्व है।
लेकिन, इस बार मई के महीने में मोदी सरकार को लू लग ही गयी। ऐसा मैं कर्नाटक चुनाव के आधार पर नहीं कह रहा हूं। मैं आज कई राज्यों में लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव के नतीजों की भी बात नहीं कर रहा। मेरा आधार है एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण, जो विख्यात समाजशास्त्रीय संस्था सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी) ने एबीपी न्यूज के लिए किया (एक जमाने में मैं भी सीएसडीएस से जुड़ा हुआ था, मगर अब मेरा इस संस्था या इस सर्वे से कोई संबंध नहीं है)।
मई के पहले तीन सप्ताह में 15,859 उत्तरदाताओं से उनके घर जाकर बातचीत पर आधारित यह सर्वे देश के जनमत का सबसे विश्वसनीय आईना है। इन्हीं दिनों कुछ अखबारों ने इससे बड़े सर्वे भी छापे हैं, लेकिन सिर्फ इंटरनेट की दुनिया या अखबार के उत्साहित पाठकों की राय को देश की राय समझने की भूल नहीं करनी चाहिए।
सीएसडीएस का सर्वेक्षण हर छह महीने बाद देश के कोने-कोने की धूल छानता है, हर तरह के व्यक्ति के घर जाकर उनकी भाषा में उनकी राय सुनता है। गौरतलब है कि इस सर्वे की पिछली दो रिपोर्ट ने भाजपा और नरेंद्र मोदी को चुनावी दौड़ में काफी आगे बताया था और भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ताओं ने इस सर्वे का गुणगान किया था।
सीएसडीएस सर्वे की नवीनतम रिपोर्ट मोदी सरकार की सेहत के बारे में छह चिंताजनक संकेत देती है। पहला संकेत तो वोट प्रतिशत का थर्मामीटर है, जो दिखाता है कि पिछले सालभर में बीजेपी को वोट देने वालों की संख्या सात प्रतिशत गिर गयी है।
साल 2014 में 31 प्रतिशत वोट हासिल करनेवाली बीजेपी का पारा पिछले साल तक चढ़कर 39 प्रतिशत तक पहुंच गया था, लेकिन अब गिरकर वापस 32 प्रतिशत पर आ गया है। कांग्रेस को उतना फायदा नहीं हुआ है और उसका वोट 25 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है। भारतीय जनता पार्टी अब भी आगे है, लेकिन उसके चढ़ाव का उतार अब शुरू हो गया है।
असली खबर सिर्फ थर्मामीटर से नहीं, बल्कि वोटों के क्षेत्रवार एक्सरे से पता लगती है। इस सर्वे के मुताबिक भाजपा को वोट का असली नुकसान राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी भाषी प्रदेशों में हुआ है, जहां उसे सीटों का भारी नुकसान हो सकता है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को स्पष्ट बढ़त है, तो उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा को गठबंधन के अलावा अपने-अपने वोट पड़ने का भी फायदा हो रहा है। भाजपा को वोटों में इजाफा पूर्व में हो रहा है, लेकिन वहां ओडिशा को छोड़कर कहीं सीट बढ़ाने की गुंजाइश नहीं है।
आजकल सर्वे के एमआरआइ से अलग-अलग सामाजिक वर्गों के रुझान का भी अनुमान लग जाता है। यहां भी खबर भाजपा के लिए अच्छी नहीं है। पिछले सालभर में भाजपा को किसानों, दलितों और आदिवासियों में वोट का सबसे भारी नुकसान हुआ है। किसानों में भाजपा का वोट 12 प्रतिशत गिरा है।
दलित और आदिवासी दोनों तबकों में 2014 में कांग्रेस भाजपा से पिछड़ गयी थी। अब इन दोनों में बीजेपी कांग्रेस से पीछे चल रही है। किसानों में गुस्सा बहुत साफ है। मोदी सरकार ने किसानों के लिए जो किया, उससे संतुष्ट किसानों की तुलना में दोगुने से ज्यादा ऐसे किसान हैं, जो बिल्कुल असंतुष्ट हैं।
चौथा संकेत प्रधानमंत्री की पसंद के सवाल पर जनता की नाड़ी परीक्षा से मिलता है। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद पसंदीदा प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम लेनेवालों का प्रतिशत 36 से बढ़कर पिछले साल 44 तक पहुंच गया था. लेकिन, अब पिछले एक साल में घटकर सिर्फ 34 पर रह गया है। राहुल गांधी अब भी पीछे हैं, लेकिन फासला अब 10 प्रतिशत का बचा है। उधर प्रधानमंत्री को अविश्वसनीय माननेवालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से जुड़ा पांचवां संकेत उनकी सरकार की लोकप्रियता से जुड़ा है। सालभर पहले मोदी सरकार से असंतुष्ट लोगों से लगभग ढाई गुना ज्यादा वे लोग थे, जो सरकार से संतुष्ट थे। लेकिन, पिछले महीने संतुष्ट और असंतुष्ट दोनों की संख्या बराबर हो गयी है।
चाहे देश का विकास हो या महंगाई, चाहे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण हो या सांप्रदायिकता में कमी, चाहे कश्मीर समस्या हो या पाकिस्तानी आतंकवाद, हर मुद्दे पर इस सरकार के काम को अच्छा बतानेवालों से ज्यादा वही हैं, जो सरकार के काम को बुरा बता रहे हैं।
इन सब संकेतों का निचोड़ छठे संकेत में मिलता है। सर्वे में पूछा गया ‘क्या आप मोदी सरकार को एक और मौका देना चाहेंगे’? सिर्फ 39 प्रतिशत ने हां में जवाब दिया और 47 प्रतिशत ने कहा कि वे मोदी सरकार को दोबारा मौका नहीं देना चाहते।
पांच साल पहले मई 2013 में मनमोहन सिंह की सरकार के बारे में भी इसी सर्वे ने यही सवाल पूछा था। तब 31 प्रतिशत ने हां कहा था और 39 प्रतिशत ने एक और मौका देने से इनकार किया था। यानी चुनाव से एक साल पहले मनमोहन सिंह सरकार की एंटी इनकंबैंसी का तापमान कुछ वैसा ही था, जो आज नरेंद्र मोदी सरकार का है।
मगर, एक अंतर है। तब देश के सामने कांग्रेस से गुस्से को दिशा देनेवाला एक रास्ता था। आज वह विकल्प कहां है? सर्वे इसका जवाब नहीं देता।

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