ढ़ाई महीने बाद लावारिस महिला को घर-परिवार वापस मिला


छतरपुर। निर्वाना फाउण्डेशन द्वारा संचालित स्वाधार गृह एक बार फिर विपत्तिग्रस्त एवं लावारिस महिला सुनीता यादव का सहारा बना है। सुनीता गत् 28 अप्रैल को गढ़ीमलहरा में लावारिस हालत में मिली थी। परिजनों का पता नहीं चलने पर गढ़ीमलहरा थाना की पुलिस सुनीता को निर्वाना फाउण्डेशन द्वारा संचालित स्वाधार गृह में लेकर आई थी।
जब सुनीता यादव को निर्वाना फाउण्डेशन में लाया गया था, तब वो कुछ भी बोल नहीं पा रही थी, कई दिनों से भूखे प्यासे, बिना सोये, बिना नहाये, दर दर की ठोकरे खाने से उसकी हालत पागलांे जैसी हो गयी थी उसके शरीर एवं कपड़ो से बहुत बदबू आ रही थी उसे अपने नाम के सिवा कुछ भी याद नहीं था उसके पास एक थैली में कुछ गंदे कपड़े और एक छोटी से डायरी थी जिसमे कुछ फ़ोन नंबर लिखे हुए थे उस रात उसे खाना खिलाकर सुला दिया गया और अगले दिन सुबह उसे नहलाकर नये साफ़ सुथरे कपड़े पहनाये गये कुछ दिनों तक वो सिर्फ खाना खाती और सोती रहती थी किसी से भी बात नहीं करती थी निर्वाना फाउण्डेशन परिवार मे आने के बाद उसकी इतनी देखभाल और सेवा की गयी कुछ ही हफ्तों में वो ठीक होने लगी और सब लोगों के साथ मिल जुल कर खुश रहने लगी।
उसकी डायरी में जो चार पांच नंबर लिखे हुए थे, उस पर हर रोज एक उम्मीद से कॉल करते थे की शायद सुनीता के बारे में कुछ पता चल जाये पर कोई भी नंबर पर जवाब नहीं मिलता था। दिन बीतते गए और सुनीता पहले से बहुत अच्छी होने लगी। वो बहुत ही शांत रहती थी और धीरे धीरे बोलती थी कुछ समय बाद उसे सब कुछ याद आने लगा और उसने बताया की वो जिला प्रतापगढ़ उ0प्र0 की रहने वाली है और 12वीं पास है।
जुलाई के पहले हफ्ते में एक बार फिर से उसकी डायरी में लिखे नंबरों पर कॉल करके सुनीता के बारे में पता करने की कोशिश करने पर मालूम पड़ा कि सुनीता जिसकी उम्र अभी 27 वर्ष है वो गाँव बभनपुर थाना रानीगंज कैथोला जिला प्रतापगढ़ उ.प्र. की रहने वाली है और उसने 7 वर्ष पहले 12वीं कक्षा पास की थी और उसके बाद उसके माता पिता ने उसकी शादी पास के ही गाँव में कर दी थी उसका पति एक ट्रक ड्राईवर था और रात को दारू पी कर उसे बहुत मारता पीटता था। शादी के दो साल के बाद उसने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिसकी बीमारी से मृत्यु हो गई थी। जिसकी वजह से उसे बहुत सदमा लगा और वो एकदम चुपचाप रहने लगी ससुराल वाले भी उसको बहुत तंग करते थे। दो साल पहले वो अपने मायके अपने माता पिता के पास चली आई थी और उन्हीं के पास रहने लगी। सुनीता के पिता दिल्ली में ऑटो रिक्शा चलाते हैं और बड़ा भाई भी दिल्ली में काम करता है। गाँव में उसकी माँ और एक छोटी बहन और भाई रहते है आये दिन उसकी अपने बहन-भाई से लड़ाई होती रहती थी और उसकी वजह से एक दिन गुस्से में आकर वो 16-17 अप्रैल को बिना किसी को बताये घर छोड़ कर चली गयी घर वालो ने सुनीता को बहुत खोजा पर वो नहीं मिली।
निर्वाना फाउण्डेशन द्वारा सुनीता की खबर मिलते ही घर वाले बहुत खुश हुए और 11 जुलाई 18 को जब उसके पिता सुनीता यादव को लेने निर्वाना फाउण्डेशन छतरपुर पहुंचे, तब सुनीता को जीवित देखकर उनकी आखों से आँसू बहने लगे और उन्होंने निर्वाना फाउण्डेशन को बहुत धन्यवाद दिया कि उनकी खोई हुई बेटी को पिछेले ढाई महीने से अपने पास सुरक्षित रखकर उसकी देखभाल की और उसे एक नया जीवन दियां स्वाधार गृह की कागज़ी कार्यवाही करने के बाद सुनीता को उसके पिता रामदुलारे यादव और परिवार को सुपुर्द कर दिया गया और वो ख़ुशी ख़ुशी अपने गाँव प्रतापगढ़ उ.प्र. गए।
एक बार फिर से निर्वाना फाउण्डेशन छतरपुर द्वारा संचालित स्वधार गृह के मध्यम से ढाई महीने के बाद एक लावारिस एवं मानसिक कमजोर महिला को उसका खोया हुआ घर और परिवार वापस मिल गया।

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